कुंडली अध्ययन
कुंडली व्यक्ति के संपूर्ण जीवन का दर्पण होती है। इसमें ग्रहों की स्थिति, नक्षत्रों का प्रभाव, और विभिन्न योगों का विश्लेषण किया जाता है, जिससे यह पता चलता है कि व्यक्ति के जीवन में कौन–कौन सी प्रमुख घटनाएँ घटित हो सकती हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, कुंडली का अध्ययन न केवल भविष्यवाणी के लिए किया जाता है, बल्कि आत्म–विश्लेषण और आत्मविकास के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
कुंडली अध्ययन के माध्यम से यह जाना जा सकता है कि कौन से ग्रह व्यक्ति के जीवन में शुभ प्रभाव डाल रहे हैं और किन ग्रहों के कारण समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। गरुड़ पुराण में भी उल्लेख है कि जन्मकुंडली में स्थित ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति के पूर्व जन्म के कर्मों से जुड़ा होता है और इन्हें समझकर उचित उपाय करने से जीवन की कठिनाइयों को कम किया जा सकता है।

“सर्वं ग्रहकृतं पापं, ग्रह एव विनाशयेत्।” (गरुड़ पुराण, अध्याय 14)
अर्थात: व्यक्ति के जीवन में जो भी कष्ट और बाधाएँ आती हैं, वे ग्रहों के कारण होती हैं और उन्हीं ग्रहों के उपाय करके इन समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।
कुंडली अध्ययन से दशा, अंतरदशा, गोचर और विभिन्न ग्रहों की युति को देखकर यह तय किया जाता है कि व्यक्ति के जीवन में किस समय सकारात्मक परिवर्तन आएंगे और किस समय सावधानी बरतने की आवश्यकता होगी। उचित मार्गदर्शन प्राप्त करके व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली संभावित समस्याओं का पूर्वानुमान लगाकर उनके समाधान हेतु आवश्यक ज्योतिषीय उपाय अपना सकता है, जिससे वह अपने जीवन को संतुलित और सुखमय बना सके।