रत्न धारण के सुझाव
रत्नों का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में गहराई से देखा जाता है। वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की ऊर्जा को संतुलित करने के लिए रत्नों का विशेष स्थान है। प्रत्येक ग्रह एक विशेष रत्न से जुड़ा होता है, और सही रत्न धारण करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। बृहद् जातक में कहा गया है कि उचित रत्न धारण करने से ग्रहों के दोष शांत होते हैं और सौभाग्य की वृद्धि होती है।
रत्न धारण करने से पहले जन्मकुंडली का गहराई से विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक होता है, क्योंकि गलत रत्न विपरीत प्रभाव भी दे सकता है। रत्न को शुभ मुहूर्त, उचित धातु और विधिवत शुद्धिकरण के साथ धारण करना चाहिए, तभी वह पूर्ण फलदायक सिद्ध होता है। ज्योतिषीय सलाह से धारण किया गया रत्न न केवल जीवन की बाधाओं को दूर करता है, बल्कि आत्मबल, आकर्षण और आत्मविश्वास में भी वृद्धि करता है।

“रत्नैः संधारितैः सर्वे, ग्रहाः प्रसन्नतां ययुः।”
अर्थात: सही रत्न धारण करने से सभी ग्रह प्रसन्न होते हैं।
रत्नों का चयन अत्यंत सावधानीपूर्वक करना चाहिए, क्योंकि यदि गलत रत्न धारण कर लिया जाए, तो यह अनुकूलता के स्थान पर प्रतिकूलता ला सकता है।
ग्रहों के अनुरूप रत्न और उनके प्रभाव:
- माणिक्य (रूबी) – सूर्य के लिए – नेतृत्व क्षमता बढ़ाने और आत्मविश्वास को सुदृढ़ करने के लिए।
- मोती (पर्ल) – चंद्रमा के लिए – मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन के लिए।
- पन्ना (एमराल्ड) – बुध के लिए – बुद्धिमत्ता, संवाद कौशल और व्यापार में उन्नति के लिए।
- पुखराज (टोपाज़) – बृहस्पति के लिए – आध्यात्मिकता, समृद्धि और ज्ञान वृद्धि के लिए।
- नीलम (ब्लू सैफायर) – शनि के लिए – बाधाओं को दूर करने और जीवन में स्थिरता लाने के लिए।
“यस्य रत्नं शुभं तस्य, सर्वं शुभमिदं भवेत्।”
अर्थात: यदि व्यक्ति को सही रत्न धारण कराया जाए, तो उसके जीवन में सभी कार्य शुभता की ओर अग्रसर होते हैं।
इसलिए रत्नों का चयन केवल अनुभवी ज्योतिषाचार्य के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।